अपने नेताओं पर हमलों के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंची तृणमूल कांग्रेस, हिंसा और सार्वजनिक अपमान पर जताई चिंता

अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने अपने सांसदों, विधायकों, नेताओं और कार्यकर्ताओं पर कथित हमलों तथा सार्वजनिक अपमान की घटनाओं को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। पार्टी ने जनहित याचिका दायर कर आरोप लगाया कि राज्य में उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं को राजनीतिक कारणों से निशाना बनाया जा रहा है।

सोमवार को सीनियर एडवोकेट सिरसान्या बंद्योपाध्याय ने कार्यवाहक मुख्य जस्टिस तपब्रत चक्रवर्ती की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष मामले का उल्लेख करते हुए इसकी तत्काल सुनवाई की मांग की। उन्होंने अदालत को बताया कि याचिका शुक्रवार को दायर की गई थी, लेकिन उस पर अभी तक सुनवाई नहीं हुई। दलीलों पर गौर करते हुए खंडपीठ ने मामले की तत्काल सुनवाई करने पर सहमति जताई।

याचिका में हाल के उन घटनाक्रमों का उल्लेख किया गया, जिनमें तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन, कल्याण बंद्योपाध्याय और अभिषेक बनर्जी तथा विधायक कुनाल घोष और मदन मित्रा पर कथित रूप से अंडे फेंके गए और पार्टी कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसक घटनाएं हुईं।

पार्टी ने अपनी याचिका में कहा कि यह जनहित याचिका तृणमूल कांग्रेस से जुड़े लोगों के खिलाफ लक्षित सार्वजनिक हिंसा, भीड़ द्वारा हमलों और सार्वजनिक बदनामी” की घटनाओं के मद्देनजर दायर की गई।

याचिका में दावा किया गया कि इन घटनाओं से कानून के शासन, संवैधानिक स्वतंत्रताओं, लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ। पार्टी का आरोप है कि उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं को राजनीतिक रूप से प्रेरित हिंसा, दबाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है।

तृणमूल कांग्रेस ने राज्य की कानून-व्यवस्था की स्थिति पर भी चिंता जताते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में पार्टी के कार्यकर्ता और समर्थक स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं।

याचिका के अनुसार पार्टी से जुड़े लोगों को बार-बार सार्वजनिक अपमान और शारीरिक हमलों का सामना करना पड़ा है। इसमें आरोप लगाया गया कि कई मौकों पर उन पर अंडे, स्याही और पत्थर फेंके गए। पार्टी ने यह भी दावा किया कि कुछ गंभीर मामलों में उसके कार्यकर्ताओं और नेताओं को कथित रूप से रोका गया, पीटा गया, जबरन घुमाया गया और भीड़ द्वारा प्रताड़ित किया गया।

इसके पहले गिरफ़्तारी के बाद से, टीएमसी नेता जहांगीर खान को पुलिस ने उनके गढ़ फाल्टा में तीन बार परेड कराया है। इससे नाराज़ होकर उनके समर्थकों ने – जिनकी अगुवाई कथित तौर पर उनकी पत्नी कर रही थीं – विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें इस दबंग नेता को छुड़ाने के लिए पुलिस स्टेशन पर धावा बोलने की कोशिश भी शामिल थी।

ऐसी ही एक सार्वजनिक परेड के बाद, कलकत्ता हाई कोर्ट की वेकेशन बेंच ने राज्य की बीजेपी सरकार को फटकार लगाई और इन घटनाओं के पीछे के नियमों और हालात पर रिपोर्ट मांगी। कोर्ट ने कहा कि लोगों को गिरफ़्तार किया जा सकता है और उन पर मुक़दमा चलाया जा सकता है, लेकिन उन्हें जानबूझकर बदनाम या अपमानित नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट में याचिकाकर्ता उमर फारूक गाज़ी का पक्ष रखने वाले वकील सब्यसाची चटर्जी ने कहा: “सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति को हथकड़ी या ज़ंजीर पहनाना आरोपी की गरिमा का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा है कि आतंकवादियों के मामलों में भी ऐसा नहीं किया जा सकता। एकमात्र कसौटी यह है कि क्या व्यक्ति भाग सकता है।”

(जनचौक ब्यूरो)

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